सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की अटूट सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह वह पवित्र स्थल है जहां स्वयं चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना कर अपनी खोई हुई कांति पुनः प्राप्त की थी। प्रभु शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम यह मंदिर सदियों के संघर्ष, विनाश और पुनर्निर्माण की अद्भुत गाथा समेटे हुए है। इतिहास गवाह है कि इस पावन धाम पर कितने ही आक्रांताओं ने प्रहार किए, कितनी बार इसे ध्वस्त करने का प्रयास हुआ, लेकिन हर बार भारतीय जनमानस की आस्था ने इसे पुनः खड़ा किया। सत्रह बार टूटा, सत्रह बार उठा यह मंदिर हमें सिखाता है कि सत्य और श्रद्धा के आगे काल भी नतमस्तक हो जाता है। आइए, इस गौरवशाली इतिहास को विस्तार से जानें।

सोमनाथ मंदिर

1. प्रथम विध्वंस (649 ई.)

सातवीं शताब्दी के मध्य में वल्लभी के राजा यादवों ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। यह इतिहास में दर्ज पहला बड़ा विध्वंस था। लेकिन यह क्षति अधिक समय तक नहीं टिकी। स्थानीय हिंदू शासकों और श्रद्धालुओं ने तत्काल मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। यह घटना उस परंपरा की शुरुआत थी जो अगले तेरह सौ वर्षों तक चलती रही – हर आक्रमण के बाद पुनर्निर्माण, हर विनाश के बाद पुनर्जन्म।

2. द्वितीय विध्वंस (725 ई.)

आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में सिंध से आए अरब आक्रमणकारी बनाजंह के नेतृत्व में सोमनाथ पहुंचे। उन्होंने मंदिर को भारी क्षति पहुंचाई। इस बार गुर्जर-प्रतिहार वंश के राजाओं ने मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी उठाई। उनके संरक्षण में मंदिर फिर से खड़ा हुआ और पूजा-अर्चना पुनर्जीवित हुई।

3. तृतीय विध्वंस (1024-1026 ई.)

यह सोमनाथ के इतिहास का सबसे काला अध्याय था। महमूद ग़ज़नवी, जो भारत पर सत्रह बार आक्रमण कर चुका था, इस बार सोमनाथ के अपार धन-भंडार से आकर्षित हुआ। जनवरी 1026 में उसने मंदिर पर हमला किया, यहां रखा लगभग छह टन सोना लूटा, और अनुमानतः पचास हज़ार से अधिक श्रद्धालुओं को मार डाला। उसने मंदिर को ध्वस्त कर दिया और ज्योतिर्लिंग को खंडित कर दिया।

परंतु उसका विनाश स्थायी नहीं रहा। जाटों ने उसकी वापसी यात्रा के दौरान उसे घेर लिया और भारी क्षति पहुंचाई। कहा जाता है कि 1030 में ग़ज़नवी की मृत्यु एक असहनीय बीमारी से हुई – मानो शिवकोप का परिणाम हो। गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम ने तत्काल मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण करवाया।

4. चतुर्थ विध्वंस (1299 ई.)

तेरहवीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलूघ खान (अलाफ खान) ने सोमनाथ पर आक्रमण किया। इस बार मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया और मूर्तियों को लूटकर दिल्ली ले जाया गया। परंतु इस बार भी हिंदू शासकों ने हार नहीं मानी। जालौर के राणा कुंभा ने आक्रमणकारियों का डटकर मुकाबला किया। चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में चूड़ासमा वंश के राजा महीपाल प्रथम ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

5. पंचम विध्वंस (1394 ई.)

चौदहवीं शताब्दी के अंत में गुजरात के गवर्नर (बाद में सुल्तान) मुजफ्फर शाह प्रथम ने सोमनाथ पर आक्रमण किया। उसने मंदिर को अपवित्र किया और भारी क्षति पहुंचाई। स्थानीय हिंदू समुदाय ने फिर से मिलकर मंदिर का जीर्णोद्धार किया, हालांकि इस बार पूर्व की भव्यता लौटाने में समय लगा।

6. षष्ठ विध्वंस (1451 ई.)

गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में सोमनाथ को ध्वस्त कर दिया। उसने मंदिर के पत्थरों का उपयोग अन्य निर्माणों के लिए करवाया। मांडलिक राजा और स्थानीय हिंदू सरदारों ने फिर से मंदिर की स्थापना की, इस बार और अधिक सतर्कता और सुरक्षा के साथ।

7. सप्तम विध्वंस (1536 ई.)

सोलहवीं शताब्दी के मध्य में गुजरात के सुल्तानों ने फिर से सोमनाथ को लूटा। इस समय तक मुगल काल का दबाव बढ़ रहा था, फिर भी स्थानीय हिंदू राजाओं के संरक्षण में पूजा-अर्चना जारी रही। इस आक्रमण के बाद भी मंदिर को पुनर्जीवित किया गया, हालांकि अब यह पहले जैसा भव्य नहीं रह गया था।

8. अष्टम विध्वंस (1574 ई.)

मुजफ्फर शाह द्वितीय ने सोलहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में मंदिर को फिर से नष्ट किया। अकबर के शासनकाल में हुआ यह आक्रमण स्थानीय प्रतिरोध के बावजूद सफल हुआ। लेकिन मंदिर को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका। हिंदू श्रद्धालु गुप्त रूप से पूजा करते रहे और समय आने पर पुनर्निर्माण की तैयारी करते रहे।

9. नवम विध्वंस (1665-1669 ई.)

मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में मंदिर गिराने का आदेश दिया। उसने यहां मस्जिद बनाने का प्रयास किया। इस समय मराठों ने क्षेत्र में सक्रिय रूप से हिंदुओं की रक्षा की और मंदिर को मुक्त कराने के प्रयास किए। छत्रपति शिवाजी महाराज के बढ़ते प्रभाव ने मुगलों को कमजोर किया।

10. दशम विध्वंस (1702 ई.)

औरंगज़ेब ने अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मंदिर को पूरी तरह नष्ट करवाने का आदेश दिया। उसने अपने साम्राज्य के अंतिम वर्षों में हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने की नीति तेज कर दी थी। परंतु इसके बाद मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। मराठों ने क्षेत्र पर नियंत्रण बढ़ाया और मंदिर के अवशेषों की रक्षा की।

11. एकादश विध्वंस (1706 ई.)

औरंगज़ेब ने अपनी मृत्यु से एक वर्ष पूर्व फिर से सोमनाथ को ध्वस्त करने का प्रयास किया। इस बार मस्जिद के अवशेष बने रहे। लेकिन औरंगज़ेब का साम्राज्य बिखर चुका था और वह स्वयं विनाश के निकट था। उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों ने मंदिर के खंडहरों को संरक्षित करना शुरू किया।

12. द्वादश विध्वंस (1782 ई.)

अठारहवीं शताब्दी के अंत में खान जी राव नामक स्थानीय सरदार ने मंदिर को लूटा। मराठा काल में भी छिटपुट हमले जारी रहे, लेकिन पेशवा और गायकवाड़ के संरक्षण में मंदिर की छोटे स्तर पर पूजा होती रही। इस लूट के बाद भी स्थानीय लोगों ने मंदिर को पुनर्जीवित रखा।

13. त्रयोदश विध्वंस (1783 ई.)

इसी दौर में फतेह अली ने भी मंदिर को क्षति पहुंचाई। परंतु इसी वर्ष अहिल्याबाई होल्कर ने खंडहरों के पास एक छोटा मंदिर बनवाया, जिसे आज “पुराना सोमनाथ” कहा जाता है। यह दर्शाता है कि विनाश और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया साथ-साथ चलती रही।

14. चतुर्दश विध्वंस (1787 ई.)

अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अराजकता के काल में कई छोटे हमले हुए। एक अनाम आक्रमणकारी ने मंदिर को फिर से लूटा। इस समय तक मंदिर अपने पूर्व स्वरूप में नहीं था, फिर भी श्रद्धालु यहां आते रहे और पूजा-अर्चना जारी रखी।

15. पंचदश विध्वंस (1814 ई.)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एक पठान सरदार ने सोमनाथ पर हमला किया। यह ब्रिटिश काल पूर्व का अंतिम बड़ा हमला था। स्थानीय राजपूतों ने उसका प्रतिरोध किया, लेकिन मंदिर को क्षति पहुंची। फिर भी आस्था का दीपक बुझने नहीं दिया गया।

16. षोडश विध्वंस (1842 ई.)

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में तात्या नामक स्थानीय डाकू ने मंदिर को अंतिम प्रमुख क्षति पहुंचाई। ब्रिटिश शासन के दौरान मंदिर की उपेक्षा हुई, लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने खंडहरों का पता लगाया। इसी समय स्वामी विवेकानंद ने सोमनाथ की यात्रा की और इसे पुनर्जीवित करने की प्रेरणा दी।

17. सप्तदश विध्वंस एवं पुनर्जन्म (1947-1951)

स्वतंत्रता के बाद भी सोमनाथ खंडहर के रूप में ही था। 1947 की दिवाली के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस स्थल का दौरा किया और खंडहरों को देखकर उनका हृदय विचलित हो गया। उन्होंने ठान लिया कि इस मंदिर को पुनः उसी स्थान पर खड़ा किया जाएगा।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मंदिर पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि खंडहरों को पुरातत्व विभाग को सौंप देना चाहिए। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि राष्ट्रपति और मंत्री इस आयोजन से न जुड़ें। परंतु सरदार पटेल, कन्हैयालाल मुंशी और घनश्यामदास बिड़ला दृढ़ थे।

सौराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री उछारंगराय ढेबर ने जनता से चंदा एकत्र करने की अपील की। पोरबंदर के सेठ नानजी कालिदास मेहता ने सबसे पहले एक लाख रुपये का दान दिया – यह राशि उस समय बहुत बड़ी थी।

अंततः मई 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की अध्यक्षता की। यह आधुनिक भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया।

सोमनाथ: आस्था और अहंकार का संघर्ष

सदियों के संघर्ष, लंबे प्रतिरोध, असीम धैर्य और रचनात्मकता ने सोमनाथ को जीवित रखा। यह शक्ति, विश्वास और लचीलापन का उदाहरण विश्व इतिहास में दुर्लभ है। महमूद ग़ज़नवी से लेकर औरंगज़ेब तक – सभी का एक ही भ्रम था कि उनकी तलवारें सनातन सोमनाथ को पराजित कर सकती हैं। पर वे भूल गए कि सोमनाथ का अर्थ ही “सोम” यानी अमरत्व है।

आज सोमनाथ का भव्य मंदिर अरब सागर के तट पर उतना ही प्रतापी खड़ा है, आकाश को छूता हुआ। उसके शिखर पर दस टन वजनी सोने का कलश सूर्य की किरणों में चमकता है और समुद्र की दीवार पर स्थित बाण स्तंभ दक्षिण ध्रुव की ओर इशारा करता है – यह बताते हुए कि सोमनाथ से अंटार्कटिका तक कोई भूमि नहीं है।

सारांश: अमरत्व का संदेश

सोमनाथ मंदिर का सत्रह बार टूटना और सत्रह बार उठना भारत की आत्मा की अमरता का प्रमाण है। भगवान शिव का एक नाम मृत्युंजय भी है – जिन्होंने मृत्यु पर विजय पाई। उस मृत्युंजय का यह मंदिर सदियों के आक्रमणों के बावजूद आज भी उतना ही भव्य खड़ा है, धर्म का परचम लहराता हुआ।

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, भारत के अटूट विश्वास का प्रतीक है – एक ऐसा प्रतीक जो हमें सिखाता है कि जब तक आस्था है, कोई भी तूफान हमें नहीं झुका सकता।

हर हर महादेव! 🔱

यह लेख सोमनाथ मंदिर के गौरवशाली इतिहास को समर्पित है।

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