माघ पूर्णिमा स्नान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है। आज (1 फरवरी 2026) माघ पूर्णिमा के अवसर पर सूर्योदय पूर्व स्नान करने से शारीरिक-मानसिक शुद्धि के साथ दोष संतुलन होता है। अगहन, पास यानि हेमन्त ऋतु का संचित वात दोष संतुलित होने लगता है। आगे भी यह दिनचर्या बनाये रखने से वात दोष पूर्णतः नष्ट होकर स्वास्थ्य लाभ मिलता है। नवयुवक प्राप्ति का यह सरल, मुफ्त तरीका है जो इस दिन धार्मिक महत्व द्वारा याद कराया जाता है।

माघ स्नान का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

माघ मास हिंदू पंचांग का सबसे पुण्यकार्य महीना माना जाता है, जो पौष पूर्णिमा से प्रारंभ होकर माघ पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस दौरान 30 दिनों तक नियमित स्नान, दान और व्रत का विधान है। विशेष रूप से प्रयागराज संगम, हरिद्वार, नासिक और अन्य तीर्थ स्थानों पर लाखों भक्त स्नान के लिए एकत्रित होते हैं।

स्कंद पुराण और पद्म पुराण में वर्णित है कि माघ स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। माघ पूर्णिमा का स्नान सर्वोत्तम फलदायी माना जाता है क्योंकि इस दिन चंद्रमा पूर्ण प्रभाव में होता है, जो मन को शांत करता है। गंगा स्नान से विशेष पुण्य लाभ होता है – गंगाजल घर लाकर स्नान में मिलाने से भी यही फल मिलता है। स्नान के बाद तिल दान, ब्राह्मण भोजन और गायत्री मंत्र जाप अनिवार्य है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: दोष संतुलन का रहस्य

आयुर्वेद में माघ स्नान को ऋतु चिकित्सा का हिस्सा माना गया है। शीतकाल (शिशिर ऋतु) में वात दोष बढ़ता है, जिससे जोड़ों में दर्द, बेचैनी और पाचन असंतुलन होता है। ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटा पूर्व, लगभग 4-6 बजे) ठंडे जल से स्नान वात को संतुलित करता है।

चरक संहिता (सूत्र स्थान 7/29) में कहा गया है कि प्रातःकालीन स्नान अग्नि (पाचन शक्ति) को प्रदीप्त करता है। ठंडा जल त्वचा के छिद्रों को संकुचित कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। माघ की शुष्क वायु में नदी स्नान ऋणात्मक आयन प्रदान करता है, जो अवसाद कम करता है। आयुर्वेदाचार्य के अनुसार, माघ स्नान कफ दोष भी नियंत्रित करता है, सर्दी-जुकाम से बचाता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि सुबह के शुद्ध वातावरण में स्नान कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) कम करता है, सेरोटोनिन बढ़ाता है। नदी जल के खनिज तत्व त्वचा शुद्ध करते हैं।

सही स्नान विधि: चरणबद्ध तरीका

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त में जागें। सूर्योदय से ठीक पहले स्नान करें।
  • जल: ठंडा जल (गर्म जल वर्जित), गंगाजल 2-3 बूंदें मिलाएं।
  • प्रक्रिया: दाएं पैर से जल स्पर्श करें। सिर से पैर तक 3 बार जल डालें। तिल का तेल मलें।
  • स्नानोत्तर: सूखे वस्त्र धारण करें। सूर्य को अर्घ्य दें।
  • आहार: स्नान बाद हल्का भोजन – खिचड़ी, गुड़। तिल दान करें।

विशेष टिप: कपूर या चंदन का लेप स्नान पूर्व लगाएं। महिलाओं को ऋतुस्राव काल में छूट।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

आज के व्यस्त जीवन में माघ स्नान एक सरल साधन है योग, ध्यान का विकल्प। शहरी लोग बाल्टी में गंगाजल मिलाकर घर पर ही कर सकते हैं। मेरे 10+ वर्षों के आयुर्वेदिक अभ्यास में, नियमित माघ स्नान करने वाले रोगी कम दवाएं लेते हैं। यह जीवनशैली परिवर्तन का प्रारंभ है। आयुर्वेदिक दिनचर्या में तो पूरे साल प्रातः स्नान करने कहा जाता है, कम से कम माघ मास में जब ठंढ कम हो जाती है, ऐसा अवश्य करें। वांग्भट्ट के अनुसार यदि सुबह बिना कुछ खाये ब्राम्ह मुहूर्त में स्नान किया जाये तो पेट की गैस्ट्रिक समस्याऐं ठीक होती हैं। जठराग्नि प्रज्वलित होने से वात दोष समाप्त होती, नहीं है तो होगी नहीं।

वैद्य अजित करण
आयुर्वेदिक चिकित्सक, मुजफ्फरपुर
B.Sc., आयुर्वेद प्रशिक्षण – DSVV, हरिद्वार


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